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स्वामी विवेकानंद की जीवनी, प्रारंभिक जीवन, विश्व सम्मेलन, अंतिम समय

                              स्वामी विवेकानंद की जीवनी


 अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 


परिचय:-  
स्वामी विवेकानंद की जीवनी, प्रारंभिक जीवन, विश्व सम्मेलन, अंतिम समय
स्वामी-विवेकानंद

              स्वामी विवेकानंद भारत  के  एक अनमोल रत्न है। उन्होंने शिकागो में भारत और हिंदू धर्म को संसद के धर्म संसद में पेश किया। यह दुनिया में उनका प्रसिद्ध और यादगार भाषण था।
            वह एक महान समाज सुधारक थे और बेहतर तरीके से जीवन जीने के नए तरीके देते थे । वह एक हिंदू भिक्षु थे जिन्होंने अपने गुरु स्वामी राम रामकृष्ण परमहंस के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया।

स्वामी जी पर रामकृष्ण परमहंस का बहुत प्रभाव पड़ा  ध्यान करना और आध्यात्मिकता की शक्ति को सीखा वह एक प्रसिद्ध वेदो ज्ञानी थे वह वेदो और उपन्यासो को पढ़ने में काफी रूचि रखते थे और उन्होंने पुरे विश्व को इन वेदो और उपनिषदों की  बारे  बताया तो चलिए अब हम उनके जीवन को संक्षिप्त रूप में देखेंगे  



                         सामग्री
   
1) बचपन
2 रामकृष्ण परमहंस
३) गरीबी
4) परिवर्तन
5) यात्रा
6) विश्व सम्मेलन
) पश्चिम की यात्रा
8) भारत वापस
9) आखिरी समय 


बचपन: -

स्वामी विवेकानंद की जीवनी, प्रारंभिक जीवन, विश्व सम्मेलन, अंतिम समय
भुवनेश्वरी-देवी
                उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में मकर  सक्रांति के दिन हुआ था, और उनका नाम नरेन्दरनाथ दत्त रखा गया उनका जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था उनके पिता कलकत्ता उच्च न्यायालय के वकील थे और उनकी माँ का नाम भुवनेश्वरी देवी था।

नरेंद्र नाथ और चार बेटियों के अलावा उनके पिता के दो बेटे पैदा हुए, जिनमें से दो की कम उम्र में ही मृत्यु हो गई। नरेंद्र बचपन में एक बहुत ही बुद्धिजीवी लड़का था। उनकी बहुत मजबूत याददाश्त थी। इसलिए, आठ साल की उम्र में, उन्हें हाई स्कूल में प्रवेश दिया गया। उनकी माँ का उन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा।

वह एक आध्यात्मिक महिला थीं और नरेंद्र उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। उन्होंने बहुत ही कम उम्र में विभिन्न विषयों का विशाल ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उन्हें वेदों शास्त्रों उपनिषदों में गहरी रुचि थी, 
शुरुआत में, वह इतना धार्मिक नहीं थे । उन्हे  ईश्वर के अस्तित्व पर भी संदेह था। 1881 में, नरेंद्र श्री रामकृष्ण परमहंस से मिलने गए, जो दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में ठहरे थे। वे ब्रह्म समाज और उसके दर्शन से भी बहुत प्रभावित थे।

रामकृष्ण परमहंस:-

स्वामी विवेकानंद की जीवनी, प्रारंभिक जीवन, विश्व सम्मेलन, अंतिम समय

    रामकृष्ण-परमहंस 

                            उनके माता-पिता ब्राह्मण जाति से थे। वे गरीब परिवार से  थे और अपने प्राचीन धर्म की परंपराओं के प्रति समर्पित थे। वह माँ काली के बहुत बड़े भक्त थे और उनकी दिव्य माँ के रूप में उनका ध्यान करते  रहते थे वह स्वामी विवेकानंद के गुरु भी थे। 

         एक बार रामकृष्ण और विवेकानंद के बीच विवाद हुआ। रामकृष्ण कहते हैं कि भगवान को समझो। लेकिन विवेकानंद ब्रह्म समाज से प्रभावित थे। वह देवता को समझने के लिए सहमत नहीं थे । वह कहते  है कि इसका अस्तित्व ही नहीं है । लेकिन एक समय के बाद रामकृष्ण ने नरेंद्र के साथ अपने मन को जोडा  और उन्हें भगवान के वास्तविक दर्शन कराए । तब वह देवता को स्वीकार करने के लिए सहमत हुए। 

गरीबी: -

                   स्वामी जी के जीवन में एक बार ऐसा समय आया जब वह अत्यधिक गरीबी का सामना कर रहे थे उनके पिता जी एक परोपकारी इंसान थे  जिस कारण उन्होंने पैसे नहीं बचाये। यह समय उनके जीवन का सबसे बुरा समय था इस समय उनका विश्वाश अपने गुरु से भी उठने लगा था वह लगातार चुनौतियों और मुश्किलों का सामना कर रहे थे 

स्वामी विवेकानंद की जीवनी, प्रारंभिक जीवन, विश्व सम्मेलन, अंतिम समय
स्वामी-विवेकानंद
            लेकिन जल्द ही उन्हें ब्राह्मण हिंदू धर्म के मूल दर्शन का एहसास होता है। इसके अलावा, वह एक आध्यात्मिक इंसान  है, इसलिए उनकी आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ उनकी बहुत मदद करती हैं। उनके गुरु रामकृष्ण भी उन्हें बनाने या रूपांतरित करने का पूरा प्रयास करते हैं  लेकिन चीजें सही ढंग से नहीं चलती और उनके पिता का देहांत हो जाता है इस समय वह बहुत अधिक व्यथित था और उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिया, लेकिन जल्द ही उन्हें  अपनी और ईश्वर की शक्ति का एहसास हुआ और रामकृष्ण द्वारा समर्थित ईश्वर की खोज में निकल गए  उन्हें अपने इस खोज में देवी मिली जिनसे उन्होंने धन और दौलत की जगह विवेक और बैरागी को माँगा। 



  उस दिन विवेकानंद के पूर्ण आध्यात्मिक जागरण को चिह्नित किया और उन्हें जीवन के एक तपस्वी तरीके से आकर्षित किया।

परिवर्तन: -

                  उन्होंने अपने गुरु से उन्हें ध्यान सिखाने के लिए विनती की और उनके गुरु रामकृष्ण उन्हें पढ़ाने के लिए सहमत हो गए, तब नरेंद्र भी भगवान को स्वीकार किया और माँ काली को भी मानने लगे 

       वह और उनके गुरु दोनों बहुत कठिन ध्यान करने लगे  वे लगातार सप्ताह या महीने तक ध्यान करते। स्वामी जी ने कई वेदों को भी पढ़ा और उन सभी में निपुणता हासिल की।

         नरेंद्र के पास पैसे नहीं थे  और उनके पास केवल एक कपड़ा था। वह साधु का जीवन व्यतीत कर रहे थे ।इसी प्रकार समय निकल रहा था और अब उनके गुरु रामकृष्ष्ण का स्वास्थ्य दिन-ब-दिन खराब होता जा रहा था  और उन्हें एहसास हुआ कि उनका अंतिम समय आ गया है और वे विवेकानंद से कहते हैं कि मैं आपको अपना सारा ज्ञान दे चूका हूँ और अब यह आपका कर्तव्य है कि भारत के युवाओं को जागृत और उसे हिंदू धर्म की शक्ति बताएं।

 और फिर 15 अगस्त 1886 को समाधि प्राप्त की । उन्होंने नरेंद्र को अपने पास मौजूद सभी चीजें दी थीं और उनसे कहा था कि शिष्यों की देखभाल करने के लिए सभी को आध्यात्मिक मार्ग दिखाओ।

यात्रा:-

             नरेंद्र ने यात्रा शुरू की वह लोगों के जागरण के लिए हिमालय से कन्याकुमारी तक गये । वह कई लोगों से मिले  और उन्हें जागृत किया  कई लोग उनके खिलाफ भी बोले परन्तु वह एक शांतिप्रिय किस्म के इंसान थे । और अपने शांत दिमाग से सब  कुछ सोच समझकर ही कोई भी जवाब  देते थे 

  इस यात्रा में, बहुत से लोग उनसे प्रभावित हुए  और उनके शिष्य बने और उनका अनुसरण किया । राजा खेतड़ी उन लोगों में से एक है जो उनसे बहुत अधिक प्रभावित थे और राजा खेतड़ी नरेंद्र को VIVEKANANDA की उपाधि दी ।

विश्व सम्मेलन: -

                       नरेंद्र ने  इस बात पर विचार किया  कि दुनिया की द्रिष्टी  में भारत की स्पष्ट तस्वीर बनाई जाए और भारत की शक्ति को दुनिया को बताया जाए, इसलिए वह शिकागो में एक विश्व सम्मेलन में जाने का विचार करते  है।

  राजा खेतड़ी उन्हें शिकागो जाने में मदद करते है लेकिन सम्मेलन जुलाई से सितंबर तक स्थानांतरित कर दिया गया । स्वामी जी के पास कोई पैसा नहीं था वह बहुत व्यथित हो गए । वह मदद के लिए कई समाजों में गए , लेकिन धर्म अंतर के कारण कोई भी उनकी मदद करने के लिए सहमत नहीं हुआ ।

  लेकिन आख़िरकार अमेरिकी आये  और उनकी मदद की , आखिरकार, समय आया और सम्मेलन खुला  और स्वामी जी ने अपना भाषण शुरू किया।

"भाइयों और अमेरिका की बहन"।
दो मिनट तक तालियाँ बजती रहीं और पश्चिम में उनकी अमर यात्रा शुरू हो गई।

 पश्चिम की ओर यात्रा:-  

                                            स्वामी जी ने पश्चिम की यात्रा शुरू कर दी थी। और लगभग दो साल तक पश्चिम में रहे। और अपनी शिक्षाओं को फैलाने के लिए इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, इटली, आदि की यात्रा की।


  वह मानवता का उत्थान करना चाहते थे। उनकी यात्रा के दौरान, वे जर्मनी में मैक्स मुलर से मिले, जिन्हें संस्कृत का बहुत ज्ञान था। उन्होंने उपरोक्त देशों को सिखाया और वह कुछ इस प्रकार से बात करते की लोग उनके अंदर खो जाते 

भारत वापस: -

                     अब वह वापिस भारत आए। उनका भारत में  इस प्रकार स्वागत किया गया जैसे भगवान का किया जाता है और दक्षिण भारत के लोग उनसे बहुत जयादा प्रभावित हुए थे  और उन्होंने उनकी शिक्षाओं का और उनके सिधान्तो का पालन किया उन्होंने लोगों को जागृत करने के लिए अपने शिष्यों को भारत के अलग अलग हिस्सों में भेजा।

 आखिरी समय :-

स्वामी विवेकानंद की जीवनी, प्रारंभिक जीवन, विश्व सम्मेलन, अंतिम समय
स्वामी-विवेकानंद
                                    हर व्यक्ति का अंतिम समय आता है और अब स्वामी जी का भी अंतिम समय आ चूका था अब उन्हें लग रहा था की उन्होंने इस पृथ्वी पर जितना भी काम करना था वह अब ख़तम हो चूका है और उन्होंने सन 1902 में मोक्ष की प्राप्ति की और 39  वर्ष की आयु में समाधी ले ली उनके सभी शिष्य एक बचे की भांति रोने लगे  तभी एक हवा आयी और लगा जैसे कह रही हो की भगवान कभी नहीं मरते।

तो यह था भारत के एक अत्यंत कीमती हीरे का जीवन मुझे आशा है की आपको यह पसंद आया होगा यदि आपको इससे जुड़ा हुआ कोई प्रश्न है तो निचे टिपण्णी कर सकते हैं 

                                   

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